रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा समाप्त होते ही मॉस्को के खिलाफ पश्चिमी देशों की सबसे कठोर आर्थिक चाल सामने आ गई है। G7 देशों और यूरोपीय संघ (EU) ने रूस के समुद्री तेल निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध की दिशा में गंभीर चर्चा शुरू कर दी है, जिससे रूस की तेल आय पर सीधा प्रहार होगा और वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में नई उथल-पुथल की आशंका बढ़ गई है।

G7–EU की नई तेल रणनीति

G7 और EU रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के लिए प्राइस कैप व्यवस्था खत्म कर फुल मरीटाइम सर्विसेज बैन पर विचार कर रहे हैं। प्रस्तावित बैन के तहत रूसी तेल ले जाने वाले जहाज़ों को पश्चिमी टैंकर, बीमा, वित्त और रजिस्ट्रेशन जैसी सेवाएँ नहीं मिलेंगी, चाहे तेल किसी भी देश को भेजा जा रहा हो। यह पाबंदी EU के अगले प्रतिबंध पैकेज में शामिल हो सकती है, जिस पर 2026 की शुरुआत तक निर्णय संभव माना जा रहा है।

रूस-यूक्रेन युद्ध और प्राइस कैप मॉडल

यूक्रेन पर 2022 के हमले के बाद G7 और EU ने रूसी तेल आयात पर प्रतिबंध लगाया और 60 डॉलर प्रति बैरल की प्राइस कैप प्रणाली लागू की, ताकि रूस को सीमित राजस्व मिले लेकिन वैश्विक सप्लाई झटके से बची रहे। सितंबर 2025 में EU और उसके साझेदारों ने इस कैप को घटाकर 47.6 डॉलर प्रति बैरल कर दिया, जबकि अमेरिका ने इस कटौती का साथ नहीं दिया। प्राइस कैप के बावजूद रूस ने नए रूट और ग्राहक बनाकर निर्यात को काफी हद तक जारी रखा और ऊर्जा राजस्व से युद्ध अर्थव्यवस्था को सहारा देता रहा।

रूस की ‘शैडो फ्लीट’ और मौजूदा समुद्री व्यापार

प्राइस कैप और प्रतिबंधों के बीच रूस ने पुराने और कम विनियमित टैंकरों का एक ‘शैडो फ्लीट’ तैयार किया, जो पश्चिमी प्रतिबंधों के दायरे से बाहर रहकर तेल ढोती है। अक्टूबर 2025 तक रूस के समुद्री कच्चे तेल निर्यात का लगभग 44% शैडो फ्लीट से, जबकि करीब 38% G7+, EU और सहयोगी देशों से जुड़े टैंकरों से जारी था। शेष हिस्सा गैर-प्रतिबंधित जहाज़ों के माध्यम से जाता रहा, जिससे पश्चिमी नियंत्रण सीमित हो गया।

प्राइस कैप से फुल मरीटाइम बैन तक

नई रणनीति के तहत प्राइस कैप को पूरी तरह हटाकर ऐसा बैन लागू करने पर विचार हो रहा है, जिसमें रूसी तेल से जुड़ी किसी भी शिपमेंट को पश्चिमी जहाज़, बीमा या वित्तीय सेवाएँ नहीं मिलेंगी। विश्लेषकों के अनुसार यह 2022 के बाद से रूस के तेल व्यापार पर सबसे व्यापक कदम होगा और G7–EU स्तर पर लगभग पूर्ण ब्लॉकेड के बराबर माना जा रहा है। यह योजना रूस की शैडो फ्लीट के विस्तार को भी चुनौती दे सकती है, क्योंकि पुराने जहाज़ों की सुरक्षा और वित्तपोषण पर दबाव बढ़ेगा।

भारत, चीन और एशियाई बाज़ार पर असर

रूस ने यूरोपीय बाज़ार खोने के बाद अपना अधिकांश तेल एशिया, खासकर चीन और भारत, की ओर मोड़ दिया है। अनुमान है कि रूस का एक बड़ा हिस्सा कच्चा तेल अभी भी ग्रीस, साइप्रस और माल्टा जैसे EU देशों के टैंकरों से भारत और चीन तक पहुँचता है, जिस पर फुल मरीटाइम बैन का सीधा असर पड़ेगा। यदि पश्चिमी जहाज़ और बीमा हट जाते हैं, तो रूस को एशियाई खरीदारों तक तेल पहुँचाने के लिए या तो शैडो फ्लीट बढ़ानी होगी या भारी छूट देकर वैकल्पिक रूट और साझेदार ढूँढने होंगे।

वैश्विक तेल कीमतें और बाजार की उथल-पुथल

फुल मरीटाइम सर्विसेज बैन से शुरुआत में रूस के समुद्री तेल निर्यात में कमी और शिपिंग लागत में तेज़ बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बढ़ सकता है, खासकर यदि ओपेक+ देश तुरंत अतिरिक्त सप्लाई नहीं बढ़ाते। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि रूस की शैडो फ्लीट और एशियाई खरीदारों की रियायती तेल में दिलचस्पी के कारण निर्यात पूरी तरह बंद होने की संभावना कम है, जिससे लंबे समय में कीमतें संतुलन की ओर लौट सकती हैं।

भारत के लिए चुनौतियाँ और अवसर

भारत अभी रियायती रूसी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदारों में से एक है, जिससे आयात बिल में राहत और घरेलू महंगाई नियंत्रण में मदद मिली है। यदि G7–EU बैन लागू होता है तो भारत के लिए दो प्रमुख चुनौतियाँ सामने आ सकती हैं:

  • रूस से आने वाले तेल की लॉजिस्टिक लागत और बीमा प्रीमियम बढ़ना
  • सप्लाई रिस्क के कारण कीमतों में अस्थिरता और रिफाइनरियों की योजना पर असर

साथ ही, अगर रूस अतिरिक्त छूट देने को मजबूर होता है तो भारत को लंबे समय के डिस्काउंट कॉन्ट्रैक्ट और रूबल–रुपया या वैकल्पिक मुद्रा में ट्रेड के नए विकल्प भी मिल सकते हैं।

निष्कर्ष: पुतिन–मोदी वार्ता के बाद नया दबाव

पुतिन की भारत यात्रा में रणनीतिक साझेदारी और ऊर्जा सहयोग को मज़बूत करने पर जोर दिया गया था, लेकिन वापसी के तुरंत बाद प्रस्तावित G7–EU बैन रूस पर अतिरिक्त भू-राजनीतिक और आर्थिक दबाव बना सकता है। ऊर्जा सुरक्षा, सस्ते आयात और पश्चिमी प्रतिबंधों के संतुलन के बीच भारत जैसे देशों के लिए नीति निर्णय और भी जटिल हो जाएंगे, जहाँ हर कदम का सीधा असर घरेलू महंगाई, चालू खाता घाटा और दीर्घकालिक विदेशी नीति पर पड़ेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *