इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने भोजपुरी लोक गायिका नेहा सिंह राठौर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि जब आरोपी जांच में सहयोग नहीं कर रही है, तो उसे अग्रिम जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता।

हाई कोर्ट का फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में दायर अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि दो सदस्यीय खंडपीठ द्वारा नेहा सिंह राठौर को विवेचना अधिकारी के समक्ष पेश होने का स्पष्ट आदेश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा विशेष अनुमति याचिका खारिज किए जाने के बाद भी आरोपी ने जांच में सहयोग नहीं किया, जिसे न्यायालय ने गंभीर माना। यह आदेश न्यायमूर्ति बृजराज सिंह की एकल पीठ ने पारित किया।

आरोप क्या हैं?

नेहा सिंह राठौर पर आरोप है कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद उन्होंने इंटरनेट मीडिया पर कथित रूप से अनर्गल, विवादित और देश विरोधी पोस्ट किए। अभियोजन पक्ष का कहना है कि उनकी टिप्पणियों से राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचाने, सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने और देश की संप्रभुता को कमजोर करने का प्रयास हुआ। उनके खिलाफ 27 अप्रैल 2025 को लखनऊ के हजरतगंज कोतवाली में प्राथमिकी दर्ज की गई।

बचाव पक्ष की दलील

अभियुक्त की ओर से यह दलील दी गई कि इंटरनेट मीडिया पर की गईं टिप्पणियां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आती हैं। यह भी कहा गया कि पूरे मामले में देश की एकता को खतरे में डालने या देश के विरुद्ध विद्रोह जैसी धाराओं को लागू करने का आधार नहीं बनता। बचाव पक्ष ने इसे संवैधानिक अधिकारों के दुरुपयोग के रूप में पेश करने की कोशिश की।

सरकारी पक्ष की आपत्तियां

शासकीय अधिवक्ता डा. वीके सिंह ने अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए कहा कि जब देश संवेदनशील हालात से गुजर रहा था, तब अभियुक्त ने यह टिप्पणी की कि ‘भाजपा देश को युद्ध में झोंकना और हजारों सैनिकों की जान जोखिम में डालना चाहती है’। आरोप है कि इन टिप्पणियों के जरिए पाकिस्तान से ध्यान हटाकर प्रधानमंत्री को दोषी ठहराने का दुष्प्रचार किया गया, और पाकिस्तान ने इन पोस्टों को भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा के रूप में इस्तेमाल किया।

जमानत खारिज करने का तर्क

न्यायालय ने माना कि जब उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय खंडपीठ और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट दोनों स्तर पर निर्देश स्पष्ट हो चुके थे, तब भी अभियुक्त का जांच में सहयोग न करना कानून के प्रति उदासीनता दिखाता है। ऐसी स्थिति में अदालत ने कहा कि अग्रिम जमानत देना न्याय के हित में नहीं होगा। इसलिए उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई।

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